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Sunday, May 6, 2018

ये बचपन

ये बचपन 

यादों के समंदर की एक लहर बन 
जिंदगी के किनारे से कभी-कभी 
टकरा जाता है ये बचपन। 
कच्चे आंगन को नन्हे क़दमों से नापते हुए ,
कभी गिरते , अगले ही पल उठते हुए 
धीमी रफ़्तार के मायने भी  
सीखा जाता है , ये बचपन। 
माँ की गोद में सर रख ,  
मीठी लोरी के आगोश में बहते हुए ,
ज़िन्दगी की भागमभाग में भी                     
सुकून भरी नींद ले आता है ये बचपन। 
मोबाइल की स्क्रीन पर थिरकती अंगुलियों को 
एक पल रोक
चौकड़ी वाली कॉपी में पेंसिल की लकीर और 
पाटी पर चाक से आंक -आंक 
उकेर जाता है ये बचपन। 
दोस्तों के बीच साझा होने वाले 
टिफ़िन की महक से 
महंगे रेस्त्रां के स्वाद को भी 
मात दे जाता है ये बचपन। 
बेख़ौफ़ आसमान की ऊँचाइयों को छूने का 
सपना संजोने वाला ये बचपन 
छिप-छिप कर मुझे आज भी निहारता है 
और निडर हो पंख फैला उड़ने का 
हौसला दे जाता है ये बचपन। 

 ©http://www.kitabzindagiki.com 

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ये बचपन  यादों के समंदर की एक लहर बन  जिंदगी के किनारे से कभी-कभी  टकरा जाता है ये बचपन।  कच्चे आंगन को नन्हे क़दमों से नापते हुए...